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: संत श्री 1008 गुरू महाराज रतिराम बाबा समाधि पर निशान चढाया गया

Barkat Qureshi / Mon, Dec 16, 2024 / Post views : 493

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संत श्री 1008 गुरू महाराज रतिराम बाबा समाधि पर निशान चढाया गया दिनांक 14-12-24 को प्रति वर्षानुसार इस वर्ष भी अगहन सुदी पुर्णिमा को हरदा जिले मे स्थित ग्राम जलोदा मे संत श्री 1008 गुरू महाराज रतिराम बाबा की समाधि पर माकबे परिवार (जिजगांव) एवं दिक्षित परिवार (ढोलगांव) के द्वारा बडे भक्ती भाव के साथ निशान लेकर गुरू भजनों के साथ पांच परिक्रमा कर समाधि पर निशान चढाया गया गुरू चरण पादुका का विधी विधान के साथ अभिषेक आरती कर दूर दूर से आये भक्तो द्वारा प्रसाद चढा कर गुरू से आर्शीवाद लिया गया ।इस अवसर पर गुरू परिवार शिष्य परिवार.आप पास ओर दूर दूर से आये भक्त पुरूष/ महिलाएं ओर वच्चे भारी संख्या मे उपस्थित रहे ।महंत परिवार ने संत रतीराम बाबा के इतिहास के बारे बताया ।   *संत श्री 1008 गुरू महाराज रतिराम बाबा की समाधि ग्राम जलोदा का इतिहास*   संवत 1818 से श्रध्देय गुरू महाराज रतिराम बाबा के पूर्वज हरदा तहसील के ग्राम अवगांव कलां में निवास करते थे यही बाबा का जिझोतिया परिवार में जन्म हुआ जब इनकी आयु मात्र 7से 8 वर्ष की थी तभी से इनके माता पिता का देहांत हो गया इनके पास विपुल संपति ओर जमीन जायदाद थी किंतु इनका मन किसानी में नही लगा बचपन से ही सरस्वती. ओर गायत्री माता की उपासना से स्वाध्याय से ही संस्कृत ओर हिन्दी का काफी ज्ञानार्जन किया गया रामायण .महाभारत.गीता.एवं अन्य धर्म ग्रंथ इन्हे कंठस्थ थे संस्कृत ओर हिन्दी में धारा प्रवाह प्रवचन करते थे । परिवार के सदस्य उनकी इस वृत्ति से संतूष्ठ नही थे अत: टिमरनी में गांव के बाहर आम के वृक्ष के निचे कुटिया बनाकर तपस्या में रत रहने लगें कालांतर में उन्होने अच्छी सिध्दि प्राप्त कर ली ओर उनके गूणो के समाचार सुनकर आस पास के लोग उनके सत्संग के लिए आने लगे टिमरनी टिमरनी का गदरे परिवार बाबा के चमत्कारों से अधिक प्रवाहित हुआ जिजगांव-.ढोलगांव.ओर रामपुरा के व्यास परिवार उनसे अधिक प्रवाहित हुए उनके शिष्य बन गये । उन्होने जीवन पर्यंत अविवाहित रहकर इस उपासना को ही आराधना करने का संकल्प किया जीवन के अंतिम क्षणों में जलोदा में अपने शिष्यों के साथ गणपत दास महंत को भी ग्राम जलोदा में समाधी स्थल पर आमंत्रित किया उनके शिष्य भमोरी को समाधि स्थल बनाना चाहते थे किंतु उन्हें विंध्य पर्वत के मां नर्मदा के पावन तट पर स्थित जलोदा के सुरम्य शांत और पवित्र व एकांत स्थल अधिक प्रतीत हुआ इसी स्थान को उन्होने समाधि लेने तक अपनी तपोभुमी बना कर रखा ग्राम जलौदा उस समय ग्वालियर राज्य की तहसील थी यहां थाना. कचहरी.स्कूल .अस्पताल आदि सभी सुविधाएं थी जनश्रूती है कि एक वा ग्वालियर के महाराज सिंधिया भी अपने दरवारियों के साथ आश्रम तक आये थे । महाराज सिंधिया को उस समय तेज ठंड लगी व तेज बुखार से उनका शरीर कांपने लगा बाबा ने जो शाल स्वंय ने ओड रखी थी वह महाराज के उडा दी ओर तुरंत ही अलग रखने को कहा शाल अपने स्थान पर हिलती रही महाराजा ज्वर मुक्त होकर बाबा से बात करते रहे उन्होंने बाबा को 160 एकड जमीन दान की पर उन्होने दान अस्वीकार कर दिया फिर भी सिंधिया सरकार ने माफी में इस जायदाद को बाबा के नाम कर इस भूमी की देखभाल बाबा के भतीजे गणपत दास करने लगे उक्त भूमी में से आज कुछ जमीन ग्राम अबगांव में इनके वंशजों के पास शेष है आषाढ सुदी नवमी को परम पूज्य श्री 1008 गुरू रतिराम बाबा ने समाधी ली ओर चार माह पश्चात संवत 1887 मिती कार्तिक सुदी एकादशी को प्रात: काल ब्रह्म मुहुर्त मे बाबा की समाधी को भक्तो द्वारा खोला गया बाबा का देदीप्य मान एक मुस्कुराता चेहरा देख भक्तो ने जयघोष किया बाबा ने जन समुदाय को संबोधित कर आर्शीवाद दिया और जीवित समाधी लेने की घोषणा की उन्होने उसी दिन जलोदा मे उसी स्थान पर समाधि लेकर ब्रह्मलीन हो गये ग्राम जलोदा को महान पवित्र ओर दिव्य तीर्थ घोषित कर गये उसके बाद उनके भतीजे श्रध्देय गणपत दास महाराज को गादी सौंपी गई उनके ब्राह्मलीन होने के बाद उनके पुत्र श्री भगवान दास महंत को गादीसीन कर किया गया महंत परिवार की ये परंपरा आज भी जारी है ।

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